26मई
वारणासि में रेल पटरी के बीच सोलर पैनल: भारत का पहला हरित शहर
के द्वारा प्रकाशित किया गया अभिमन्यु विलक्षण

जब वाराणसी ने यह घोषणा की कि वह अब रेलवे ट्रैक के बीच सौर पैनल लगाने वाला भारत का पहला शहर बन गया है, तो यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं थी। यह उस दिशा का संकेत था जहाँ हमारी रेलगाड़ियाँ भविष्य में चलेंगी। बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (BLW) के परिसर में शुरू किया गया यह पायलट प्रोजेक्ट, जो भारतीय रेलवे के लिए एक मील का पत्थर साबित हो रहा है, 18 अगस्त 2025 को आधिकारिक तौर पर लाइन पर लगा। इसका मतलब? अब खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए होगा, बिना किसी नए अधिग्रहण के।

यह कोई छोटी सी बात नहीं है। कल्पना कीजिए, रेल की पटरियों के बीच की वह खाली जगह, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, अब स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत बन गई है। यह प्रयोग विशेष रूप से BLW के परिसर में 'लाइन नंबर 19' पर किया गया है। यहाँ 70 मीटर लंबे ट्रैक के बीच 28 पोर्टेबल सौर पैनल लगाए गए हैं। इन पैनलों की कुल क्षमता 15 किलोवाट पीक (kWp) है। सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि ये पैनल 'रिमूवेबल' या हटाए जाने योग्य हैं। जरूरत पड़ने पर, जैसे कि ट्रैक की मरम्मत के दौरान, इन्हें आसानी से उठाया जा सकता है और बाद में वापस लगाया जा सकता है।

तकनीकी विवरण: कैसे काम करता है यह सिस्टम?

इस परियोजना की खासियत इसकी इंजीनियरिंग में छिपी है। नरेष पाल सिंह, महाप्रबंधक of बरखा रेल इंजन कारखाना ने बताया कि हर पैनल का आकार 2278x1133x30 मिमी है और इसका वजन ठीक 31.83 किलोग्राम है। इन्हें सीधे पटरियों पर नहीं, बल्कि कंक्रीट स्लीपरों पर रबर पैड और एपॉक्सी एडहेसिव के माध्यम से चिपकाया गया है। सुरक्षा और रखरखाव के लिए, हर पैनल को चार स्टेनलेस स्टील एलन बोल्ट्स से फिक्स किया गया है।

"इसका मतलब है कि ट्रेनों की आवाजाही में कोई बाधा नहीं आएगी," नरेष पाल सिंह का कहना है। "जरूरत पड़ने पर मिनटों में इन्हें हटाया जा सकता है।" यह डिजाइन पूरी तरह से घरेलू है, जिससे यह प्रोजेक्ट आत्मनिर्भर भारत की नीति के अनुरूप भी है।

ऊर्जा उत्पादन और आर्थिक लाभ

आंकड़े देखिए तो यह प्रोजेक्ट काफी वादा करता है। इस 70 मीटर के खंड से प्रतिदिन लगभग 70 यूनिट बिजली बन रही है। जब इसे पूरे किलोमीटर के स्तर पर बढ़ाया जाए, तो अनुमान है कि प्रति किलोमीटर सालाना 3.21 लाख यूनिट सौर ऊर्जा पैदा की जा सकती है। ड्रिष्टि IAS की रिपोर्ट के अनुसार, प्रति किलोमीटर ऊर्जा घनत्व 220 kWp तक पहुंच सकता है, जो प्रतिदिन 880 यूनिट बिजली देने के बराबर है।

यह बिजली सीधे लोको वर्कशॉप की जरूरतों को पूरा करेगी। इससे न केवल बिजली के बिल में भारी कमी आएगी, बल्कि कार्बन फुटप्रिंट भी कम होगा। यह भारतीय रेलवे के 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर एक ठोस कदम है।

भविष्य की योजना: 1.2 लाख किलोमीटर तक विस्तार?

भविष्य की योजना: 1.2 लाख किलोमीटर तक विस्तार?

अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो इसके परिणाम व्यापक हो सकते हैं। भारतीय रेलवे नेटवर्क की कुल लंबाई लगभग 1.2 से 1.25 लाख किलोमीटर है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले इस तकनीक को देश भर के रेलवे यार्डों के 'सेफ जोन' में लागू किया जाएगा। उसके बाद, इसे मुख्य लाइनों पर फैलाने की योजना बनाई जा सकती है।

रेल मंत्रालय ने अपने आधिकारिक X हैंडल @RailMinIndia पर इसे 'हरित और टिकाऊ रेल परिवहन की दिशा में ऐतिहासिक पहला कदम' बताया है। यह प्रयोग अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो सकता है, जहाँ भूमि की कमी ऊर्जा उत्पादन का बाधक बनी हुई है।

विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?

विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल 'स्पेस ऑप्टिमाइजेशन' का एक बेहतरीन उदाहरण है। जहाँ भूमि अधिग्रहण एक बड़ी चुनौती है, वहीं मौजूदा बुनियादी ढांचे के बीच की जगह का उपयोग करना एक स्मार्ट समाधान है। हालांकि, दीर्घकालिक रखरखाव और पैनलों की टिकाऊपन पर नजर रखना अभी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

Frequently Asked Questions

वाराणसी में रेल पटरी के बीच सौर पैनल क्यों लगाए गए?

इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय रेलवे के कार्बन फुटप्रिंट को कम करना और 2030 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना है। साथ ही, यह रेलवे यार्डों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करेगा और बिजली की लागत कम करेगा।

क्या ये सौर पैनल ट्रेनों की गति को प्रभावित करेंगे?

नहीं, बिल्कुल नहीं। ये पैनल विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए हैं ताकि वे ट्रेनों की आवाजाही में कोई बाधा न डालें। इन्हें कंक्रीट स्लीपरों पर सुरक्षित रूप से लगाया गया है और वे हल्के वजन वाले हैं।

इन पैनलों को कैसे हटाया और फिर से लगाया जाता है?

ये पैनल 'रिमूवेबल' हैं। हर पैनल को चार स्टेनलेस स्टील एलन बोल्ट्स से फिक्स किया गया है। ट्रैक की मरम्मत या रखरखाव के दौरान, कर्मचारी आसानी से इन बोल्ट्स को खोलकर पैनल हटा सकते हैं और काम结束后 वापस लगा सकते हैं।

इस परियोजना से कितनी बिजली बचेगी?

70 मीटर के इस पायलट खंड से प्रतिदिन लगभग 70 यूनिट बिजली बन रही है। अनुमान है कि यदि इसे पूरे किलोमीटर तक बढ़ाया जाए, तो प्रति किलोमीटर सालाना 3.21 लाख यूनिट सौर ऊर्जा उत्पादन की जा सकती है।

क्या इस तकनीक का विस्तार अन्य शहरों में होगा?

हां, यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो भारतीय रेलवे इसे देश भर के रेलवे यार्डों और अंततः अपने 1.2 लाख किलोमीटर लंबे नेटवर्क में लागू करने की योजना बना रहा है।

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